Human Health And Diease Neet Question

human defence and disease(human health and diease neet question)

हमारे शरीर पर वातावरण में उपस्थित अनेक प्रकार के रोगोंत्पादक (pathogenic), विषाणुओं (viraises), जावाणुओं (bacteria), कवकों (fungi) तथा
(parasitic) जन्तुओं का आक्रमण (invasãon) होता रहता है। इसके अतिरिक्त, वातावरण से अनेक प्रकार के विषैले पदार्थ भी शरीर में पहुँच सकते हैं, जैसे सर्पविष या अन्य जहरीले जन्तुओं का विष, वायु, जल आदि के प्रदूषणकारी विषैले रसायन आदि । शरीर के भीतर भी रोगग्रस्त ऊतकों द्वारा या आक्रमणकारी जीवों द्वारा विषैले पदार्थ मुक्त होते हैं।। शरीर के लिए विषैले पदार्थों (toxins) को प्रतिजन (antigens) कहते हैं। सामान्यतया, ऐसी सभी प्रोटीन्स शरीर की स्वयं की प्रोटीन्स से भिन्न हैं प्रतिजनों का काम कर सकती हैं।
शरीर में सभी प्रकार के रोगोत्पादक जीवों अर्थात् रोगाणुओं (pathogens) और प्रतिजनों (antigens) के दुष्प्रभाव का प्रतिरोध करके समस्थैतिकता, अर्थात्
होमियोस्टैसिस (homeostasis) बनाए रखने की क्षमता होती है। इसे शरीर की प्रतिरक्षा (defence) कहते हैं।human health and diease neet question

प्रतिरक्षा के दो प्रमुख भेद होते हैं- स्वाभाविक एवं उपार्जित।

  1. स्वाभाविक प्रतिरक्षा (Innate defence)
  2. विशिष्ट या उपार्जित प्रतिरक्षण (Specific defence system)

स्वाभाविक प्रतिरक्षा ( Innate Defence)

यह प्राकृतिक और जन्मजात (inborn or inherent) होती है। अतः यह किसी विशेष रोग या विशेष रोगों से शरीर की सुरक्षा-व्यवस्था न होकर सभी प्रकार के रोगों’ का सामना करने की क्षमता होती है। इसीलिए इसे व्यापक अर्थात् अविशिष्ट (nonspecific) सुरक्षा कहते हैं। इसकी प्रक्रियाओं में विविध प्रकार के रोगोत्पादक आक्रमणकारियों तथा विविध प्रकार के प्रतिजनों में भेद करने की क्षमता नहीं होती। शरीर की त्वचा बाहर से रोगाणुओं के प्रवेश को रोकती है। स्वेद ग्रन्थियों से निकले पदार्थ शरीर की सतह को अम्लीय बना देते हैं (pH 3.0-5.0)। इसके फलस्वरूप अनेक सूक्ष्मजीव त्वचा पर पनप नहीं सकते। पसीने में एक एन्जाइम भी होता है – लाइसोजाइम (lysozyme)। जो कि अनेक जीवाणुओं की कोशिका भित्ति का लयन कर देता है। यही एन्जाइम हमारी आंख, नाक, जीभ की लार में होता है ताकि जीवाणु हमारे अंगों में प्रवेश करके आक्रमण न कर सकें।
हमारी नाक के बाल भी एक छन्ने (Filter) की भांति कार्य करते हैं ताकि सांस लेते वक्त बाहर से आने वाली वायु के साथ जीवाणु बालों में ही रोक लिए जाएं।
इस प्रतिरक्षा में कोई-न-कोई गड़बड़ हो जाती है, जैसे चोट लगने से त्वचा का कट जाना। ऐसे में कोई भी जीवाणु अन्दर प्रवेश कर सकता है। परन्तु ऐसी स्थिति में शरीर की दूसरी प्रतिरक्षा प्रक्रियाएं काम करने लगती हैं जैसे कि प्रदाह या शोध (Inflammation)। प्रदाह के पांच लक्षण हैं- (i) ऊष्मा, (ii) लालपन, (iii) फुलाव, (iv) दर्द, तथा (v) भक्षी कोशिकाओं का आगमन। चोट के आस-पास की रक्त वाहिनियों में फैलाव (dilation) हो जाता है जिसके फलस्वरूप इनकी पारगम्यता बढ़ जाती है तथा भक्षकाणु (phagocytes) निकलकर चोट वाले स्थान पर पहुंचती है और आक्रमणकारी सूक्ष्मजीवों का भक्षण कर लेती हैं। मृत कोशिकाओं के इस प्रकार उत्पन्न समूह को मवाद (Pub) कहते हैं। रक्त वाहिनियों का फैलाव हिस्टामीन नामक एक रासायनिक पदार्थ के कारण होता है जो लिम्फ कोशिकाओं से उत्पन्न होता है। इस प्रक्रिया में चोट वाली जगह का ताप भी बढ़ जाता है। यह ताप वृद्धि केवल विशेष स्थान पर सीमित (localised) हो सकती है, या पूरे शरीर में भी हो सकती है। तापमान में वृद्धि आक्रमणकारी जीवाणुओं द्वारा विमुक्त विषाक्त (toxic) पदार्थों के कारण होती है। यह श्वेत रक्त कणिकाओं द्वारा विमुक्त रासायनिक पदार्थ पायरोजेन्स के कारण भी हो सकती है। human health and diease neet question

विशिष्ट या उपार्जित प्रतिरक्षण(Specific Defence System)

इस प्रतिरक्षा को उपार्जित (acquired) या अनुकूली (adaptive) प्रतिरक्षा भी कहते हैं, क्योंकि इसमें प्रत्येक प्रकार के रोगाणु (pathogens) या प्रतिजन (antigen) की पृथक् पहचान करके इसके विनाश की प्रकिया होती है, तथा एक बार किसी भी प्रकार के रोगाणु या प्रतिजन से प्रतिरक्षा के बाद इस विशेष प्रकार के रोगाणु या प्रतिजन की स्मृति (memory) बनी रहती है और अगली बार इसी रोगाणु या प्रतिजन का संक्रमण होने पर प्रतिरक्षा प्रक्रिया अधिक तीव्र और अधिक शीघ्रतापूर्वक होती है। इस प्रकार किसी रोग विशेष के एक बार हो जाने पर शरीर में इस रोग के लिए स्थाई प्रतिरक्षा स्थापित हो जाती है।

ज्ञातव्य है कि सन 1884 में मेशिनकॉफ (Metchnkoff) ने प्रतिरक्षा का कोशिकावाद (cellular theory of immunity) प्रस्तुत किया। उन्होंने पाया कि भक्षण कोशिकाएं (phagocytes) संक्रमण करने वाली कोशिकाओं का भक्षण करती हैं। इसके विपरीत सन 1890 में बेहरिंग तथा कितासातो ने पाया कि ऐसे व्यक्ति या जन्तु के रक्त में (सीरम में) जो किसी रोग से पीड़ित हो चुका हो, ऐसे पदार्थ पाए जाते हैं जो उस विशेष रोग के रोगाणु द्वारा उत्पन्न विषाक्त पदार्थों (toxins) को निष्क्रिय कर देते हैं। ये पदार्थ ऐण्टिटॉक्सिन (Anti-toxins) कहलाए। सीरम में पाया जाने वाला यही पदार्थ प्रतिरक्षी (antibody) कहलाया। प्रतिरक्षा का यह वाद ह्यूमोरलवाद (Humoral theory) कहलाया।

कालान्तर में पता चला कि जीवधारियों की प्रतिरक्षा में दोनों प्रकार की विधियां अपनायी जाती हैं। इस प्रकार, प्रतिरक्षा तन्त्र (Immune system) दो प्रकार
का होता है (1) ह्यूमोरल प्रतिरक्षा तन्त्र (Humoralimmune responses – HIR), (ii) कोशिका मध्यस्थज प्रतिरक्षा तन्त्र (Cell-mediated immune responses -CMI), इस प्रणाली की सबसे विशेष बात यह है कि इसमें अपनी तथा बाहरी कोशिकाओं में विभेदन की क्षमता होती है। बाहर से आने वाली कोशिकाएं याअन्य कोई पदार्थ प्रतिजनी (antigen) कहलाता

इसके जवाब में प्रतिरक्ष तंत्र एंटीबाडीज उत्पन करती है अदिकांस प्रतिजन प्रोटीन या कार्बोहाइड्रेटयुक्त बड़े अणु होते हैं। सभी प्रतिजनी,
जीवाणु नहीं होते। परागकण प्रतिरोपित ऊतक आदि। सभी बाहरी पदार्थ प्रतिजनी होते हैं। प्रतिरक्षी तन्त्र की कोशिकाएं – लिम्फ कोशिकाएं प्रतिरक्षी तंत्र में मुख्य भूमिका अदा करती हैं। लाल अस्थि मज्जा में बनने के बाद वहीं रह जाने वाली कोशिकाएं B कोशिकाएं कहलाती हैं, और जो थाइमस में चली जाती है वे T कोशिकाएं कहलाती हैं। शरीर के विभिन्न प्रतिजनों (Antigens) के लिए विभिन्न B कोशिकाएं होती हैं। परन्तु इसके सक्रियता के लिए प्रतिजन द्वारा उत्तेजन आवश्यक होता है। ज्यों ही कोई प्रतिजन शरीर में आता है, उसके लिए विशिष्टीकृत B कोशिका से अनेक प्लाज्मा कोशिकाएं (plasmacells) बनती हैं जो कि 2000 अणु/सेकण्ड की दर से प्रतिरक्षियों (antibodies) का निर्माण करती हैं।human health and diease neet question
कोशिकाएं दो प्रकार की होती हैं

मारक T कोशिकाएं (Killer T Cells) तथा सहायक T कोशिकाए (Helper T Cells) । मारक T कोशिकाएं प्रतिरक्षि कोशिकाओं के निर्माण में सहायक होती हैं।

एक और प्रकार की T कोशिकाएं होती हैं- सप्रेसर(suppressor) T कोशिकाएं, जो अपनी ही कोशिकाओं को मारने से रोकती हैं। जब प्रतिजन द्वारा आक्रमण होता है तो B और T कोशिकाएं प्रेरित होकर असंख्य लड़ाकू कोशिकाओं के अलावा स्मृति कोशिकाएं (memory cells) भी बनाती हैं।
यदि दोबारा आक्रमण होता है, तो ये स्मृति पुनः लड़ाकू कोशिकाएं बनाती है। स्मृति कोशिकाएं काफी लम्बे समय तक जीवित रहती हैं। ये प्लीहा तथा
लिम्फगांठों में संचित रहती हैं। यही कारण है कि कई रोग एक बार होने के बाद दोबारा नहीं होते। इसे सक्रिय प्रतिरक्षण (active immunity) कहते हैं।

जब किसी विशेष रोग के प्रति प्रतिरक्षियों का निर्माण अत्यन्त धीमा हो, या बिल्कुल न हो तो दूसरे जीवधारी में प्रतिजन को अन्तःक्षेपित करते हैं। जिससे
उसमें प्रतिरक्षियां उत्पन्न हो जाती हैं। उस जीवधारी के खून से सीरम अलग कर देते हैं। प्रतिरक्षी युक्त इस सीरम को ऐण्टिसीरम (antiserum) कहते हैं। इसका अन्तःक्षेपण रोगी व्यक्ति में किया जाता है

टीकाकरण (vaccination)

शरीर पर एक बार किसी जीव या प्रतिजन का प्रकोप हो जाने पर इससे उतेजना होने वाले विसिसिट लिम्फोसाईट की संक्या लसिका अंगो में बहुत बड जाती है दुसरे सब्दो में इस विषेस प्रकोप या रोग के लिए शरीर की प्रतिरक्षा पूर्णरुपेन स्थापित और बलवती हो जाती है अत दुबारा इस प्रकोप या रोग के होने की सम्भावना कम हो जाती है। कई प्रकार के घातक रोगों से बचने के लिए, अब चिकित्सा-विज्ञान में ऐसे रोगों के लिए शरीर की प्रतिरक्षा पहले से ही स्थापित करने की विधियाँ ज्ञात हैं। ऐसी एक विधि में किसी रोग के रोगाणुओं को मारकर या प्रभावहीन बनाकर, या सम्बन्धित प्रतिजन को प्रभावहीन बनाकर, शरीर में पहुँचा देते हैं। इसे टीका लगाना (vaccination) कहते हैं। इससे शरीर में रोगों से सम्बन्धित प्रतिरक्षी पदार्थ अर्थात् ऐन्टीबॉडीज बन जाते हैं और प्रतिरक्षण स्थापित हो जाता है। इंग्लैण्ड के वैज्ञानिक, एडवर्ड जेनर (Edward Jenner, 1798) ने चेचक (small pox) की
रोकथाम के लिए चेचक के प्रभावहीन विषाणु (virus) का टीका लगाकर टीकाकरण प्रारम्भ किया। टाइफॉइड, कुकुर-खाँसी (Whooping cough or patussis), डिप्थीरिया (diphtheria) आदि जीवाणु-जनित (bacterial) रोगों के लिए मरे हुए सम्बन्धित जीवाणुओं के टिटेनस आदि के लिए प्रभावहीन प्रतिजनों के तथा पोलियो, पीतज्वर, खसरा, चेचक आदि विषाणुजनक (viral) रोगों के लिए सम्बन्धित विषाणुओं को प्रभावहीन बनाकर इनके टीके लगाए जाते हैं। डिप्थीरिया, कुकुर खाँसी तथा टिटेनस (tetanus) से बचाव के लिए बच्चों को DPT नामक त्रिगुण टीका (triple vaccine) लगाते हैं। इसी प्रकार, बच्चों को यक्ष्मा अर्थात् क्षयरोग (tuberculosis) से बचाव के लिए BCG का टीका लगाया जाता है।human health and diease neet question

चेष्ट एवं निश्चेष्ट प्रतिरक्षा (Active and Passive Immunity)

टीका लगाने के बाद शरीर में अपनी प्रतिरक्षण प्रतिक्रियाओं द्वारा ही उपयुक्त ऐन्टीबॉडीज का संश्लेषण होता है। इसे इसीलिए चेष्ट प्रतिरक्षा (Active
Immunity) कहते हैं। कुछ रोगों से बचाव के लिए उपयुक्त ऐनटीबॉडी प्रयोगशाला में तेयार करके रोग की सम्भावना से पहले ही शरीर में इन्जेक्ट कर दिए जाते हैं। किसी ऐसे व्यक्ति के रुधिर सीरम (blood serum) को भी, जो रोग से प्रभावित होकर ठीक हो गया हो, दूसरे व्यक्ति के शरीर में इन्जेक्ट कर सकते हैं, क्योंकि इस सीरम में उपयुक्त ऐन्टीबॉडीज होते हैं। ऐसे रूधिर सीरम को एण्टीसीरम (Antiserum) कहते हैं। इसमें उपस्थित एन्टीबॉडीज कुछ समय के लिए शरीर में सक्रिय बने रहते हैं। यदि इस बीच सम्बन्धित रोगाणु या प्रतिजन शरीर में पहुँच जाते हैं तो इन्हें ये ऐन्टीबॉडीज नष्ट कर देते हैं। इसे शरीर की निश्चेष्ट (passive) प्रतिरक्षा कहते हैं। इसकी खोज सन् 1890 में एमिल वान बेहरिंग (Emil Von Behring) ने पशुओं में टिटेनस (tetanus) तथा मनुष्य में डिप्थीरिया ( diphtheria) नामक रोगों की रोकथाम के प्रयास के दौरान की।

प्रतिरक्षी तन्त्र का व्यतिक्रम (Malfunction of Immune System)

ऐलर्जी (Allergy)

यह प्रतिरक्षण का एक महत्वपूर्ण पार्श्व-प्रभाव(side effect) होता है। यदि किसी ऐसे प्रतिजन जिसके लिए प्रतिरक्षण तन्त्र अतिसंवेदनशील (Hypersensitive) हो चुका है, बहुत-सी मात्रा अचानक शरीर में पहुँचकर फैलती है, तो कुछ ही मिनटों में, प्रायः पूर्ण शरीर में, तीव्र एवं असाधारण (abnormal) या विपथगामी (aberrani) प्रतिरक्षण प्रतिक्रिया होने लगती है। सभी ऊतकों में, प्रदाह (inflammation) प्रतिक्रिया के फलस्वरूप, पूरा शरीर फूल सकता है: त्वचा पर दाने उभर आते हैं। इसे ऐलर्जी कहते हैं। इसमें ऊतकों की विस्तृत क्षति और व्यक्ति की मृत्यु तक हो सकती है। कुछ लोगों को दवाइयों, सौन्दर्य-प्रसाधनों (cosmetics), रंगों, आदि से प्रायः सीमित ऐलर्जी हो जाती है। ऐलर्जी उत्पन्न करने वाले पदार्थों को ऐलर्जेन्स (allergens) भी कहते हैं। कभी-कभी अपने ही शरीर में बनने वाले किसी पदार्थ या अपने ही शरीर के किसी ऊतक के प्रति प्रतिरक्षण तन्त्र अतिसंवेदनशील होकर ऐलर्जी उत्पन्न कर देता है। इसे स्वप्रतिरक्षण (autoimmunity) कहते हैं।human health and diease neet question

संक्रामक व्याधियाँ (Infectious Diseases)

संक्रामक रोग हानिकारक सूक्ष्म जीवों (रोगाणुओं) के कारण होता है, उदाहरणतः जीवाणु, विषाणु, कृमि, कवक एवं प्रोटोजोआ । रोग कारक जीव का संचरण वायु, जल, भोजन, रोगवाहक कीट तथा शारीरिक सम्पर्क के द्वारा एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में होता है। इसीलिए इन्हें संचरणीय या संक्रामक रोग कहते हैं। संक्रामक अभिकर्ता की प्रकृति के आधार पर संक्रामक रोगों को अधोलिखित भागों में विभक्त किया जा सकता है। यथा-

1. जीवाणु जनित रोग

– हैजा (Cholera)- विब्रियो कोलेरी (Vibrio cholerae)
– डिफ्थीरिया -कॉरिनबैक्टीरियम डिफ्थेरिआई
– क्षय रोग -माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस
– कोढ़ (Leprosy)-माइकोबैक्टीरियम लैप्री
– टिटेनस- क्लोस्ट्रीडियम टिटेनी
– टायफॉइड -साल्मोनेला टायफोसा
– प्लेग -पाश्चुरेला पेस्टिस
– काली खांसी-बोर्डीटेला परटूसिस
– न्यूमोनिया-डिप्लोकोकलन्यूमानी
– गोनोरिआ-निसेरिया गोनोरहीआ

हैजा(CHOLERA)

यह रोग विब्रियो कोलेरा नामक जीवाणु से होता है जो जल खाद पदार्थोंप तथा मखियो द्वारा तेजी से फेलता है उलटी एव दस्त इस रोग के विसिस्ट लक्षन है दस्त पतले तथा सफेद रंग लिए होते है दस्तो तथा उल्टियो के कारण जल की कमी हो जाती है पेशाब बंद हो जाता है हाथ पेरो में ऐठन हो जाती है तथा रोगी की मोत भी हो सकती है

परिभाषा: हैजा एक तीव्र पेट का संक्रमण है जिसका कारण भोजन या पानी का सेवन करना होता है जिसमें वाइब्रियो चोलेरे नामक जीवाणु लिप्त होता है।

लक्षण: हैजा के लक्षण हल्के से लेकर गंभीर तक हो सकते हैं और इसमें तेज़ दस्त, उल्टी, और पैरों में दर्द शामिल हो सकता है। गंभीर मामलों में, तेज़ी से तेज़ डेहाइड्रेशन और इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन हो सकता है, जो तत्काल उपचार न होने पर शॉक और मौत तक जा सकता है।Human Health And Diease Neet Question

प्रसार: हैजा आमतौर पर दूषित पानी स्रोतों या भोजन के माध्यम से फैलता है। खराब स्वच्छता और स्वच्छता अनुसारण इसके प्रसार में योगदान करते हैं, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहां साफ पानी और स्वच्छता सुविधाओं की अपेक्षा नहीं है।

उपचार: हैजा का उपचार मुख्य रूप से प्रीमिक्सड पानी या इंट्रावेनस तरलीकरण थेरेपी में शामिल होता है, जो दस्त और उल्टी के माध्यम से खोए गए तरल और इलेक्ट्रोलाइट को बदलने के लिए होता है। गंभीर मामलों में, ऐंटीबायोटिक्स भी निर्धारित किए जा सकते हैं ताकि लक्षणों की अवधि और गंभीरता को कम किया जा सके।

रोकथाम: हैजा की रोकथाम में साफ पीने के पानी, अच्छे स्वच्छता, जैसे नियमित हाथ धोना, और स्वच्छता बुनियादी होती है। टीकाकरण भी उपलब्ध हैं और जोखिम में पड़ने वाले व्यक्तियों के लिए सिफारिश की जाती है, जैसे कि एंडेमिक क्षेत्रों में यात्रा करने वाले या प्रकोप के दौरान।Human Health And Diease Neet Question

वैश्विक प्रभाव: हैजा बहुत से देशों में एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या है, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहां स्वच्छता और स्वच्छता संरचना की कमी है। उच्च गुणवत्ता के पानी और स्वच्छता, स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुँच, और प्रबंधन के संदर्भ में अधिकतम शुद्धि होने के लिए प्रयासों की आवश्यकता है।

ऐतिहासिक संदर्भ: हैजा कई शताब्दियों से एक महत्वपूर्ण वैश्विक स्वास्थ्य खतरा रहा है, जिसमें नियमित अंतराल में प्रकोप होता रहा है। मॉडर्न स्वच्छता और पानी की उपचार पद्धतियों का विकास ने बहुत से हिस्सों में रोग के प्रसार को नियंत्रित करने में मदद की है, लेकिन यह विश्व में कई हिस्सों में प्रभावित करता है, विशेष रूप से कम आय वाले देशों और अवसान प्रणालियों के क्षेत्रों में।

वर्तमान स्थिति: हैजा को नियंत्रित करने में काफी प्रगति हुई है, खासकर पानी और स्वच्छता बुनियादी में सुधार करने और स्वास्थ्य सेवा की पहुंच में वृद्धि होने के माध्यम से, लेकिन यह विश्व में कई हिस्सों में एक खतरा के रूप में बना रहता है। भविष्य में हैजा प्रकोपों को रोकने और नियंत्रित करने के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों को मजबूत करने, साफ पानी और स्वच्छता तंत्रों तक पहुंच को बढ़ाने, और निगरानी और प्रतिक्रिया तंत्रों को सुधारने के प्रयास आवश्यक हैं।Human Health And Diease Neet Question

निष्कर्ष: हैजा विश्व में एक महत्वपूर्ण ग्लोबल स्वास्थ्य चुनौती बना हुआ है, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहां स्वच्छता और स्वच्छता संरचना में कमी है। प्रतिबंधन प्रयास स्वच्छ पानी, स्वच्छता, स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच, और वैश्विक स्वास्थ्य प्रणाली के माध्यम से सुधार की जरूरत है, ताकि भविष्य में हैजा प्रकोपों के प्रसार को नियंत्रित किया जा सके और उसके प्रभाव को कम किया जा सके।

Diptheria

परिभाषा: डिप्थीरिया एक संक्रामक रोग है जो की बैक्टीरिया Corynebacterium diphtheriae द्वारा होता है। यह रोग आमतौर पर गले में जाम लगने के कारण सूजन और अधिक संतुलित बातन के साथ आता है, जिससे साँस लेने में दिक्कत हो सकती है।

लक्षण: डिप्थीरिया के लक्षणों में सामान्य बुखार, सूजे हुए गले में सफेद परत के उपस्थिति, थकान, और फाइटिंग साँस लेने की दिक्कत शामिल होती है। यह रोग अगर संभावित है, तो डिप्थीरिया टॉक्सीन द्वारा प्रतिरक्षण की जाती है और अगर डिप्थीरिया स्थिति गंभीर होती है, तो उपचार अधिक उचित होता है।

प्रसार: डिप्थीरिया रोगी के संपर्क में आने वाले शरीर के साथ संपर्क के माध्यम से यह रोग फैलता है। डिप्थीरिया की बूंद संक्रमण वाले वायरस का संपर्क, संक्रमित वायरस को छूना, या इसका निर्माण करना शामिल हो सकता है।

उपचार: डिप्थीरिया का उपचार बाक्टीरियल लक्षणों के साथ अंतिम उपचार के लिए एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल करता है। अन्य उपचारों में डिप्थीरिया टॉक्सीन का प्रयोग उन लोगों के लिए होता है जो रोग के प्रतिरक्षण में सक्षम नहीं हैं।

प्रतिरोध: डिप्थीरिया से बचाव के लिए, लोगों को डिप्थीरिया टॉक्सीन से टीका लगवाना चाहिए, जो उन्हें इस रोग से सुरक्षित रखता है।Human Health And Diease Neet Question

वैश्विक प्रभाव: डिप्थीरिया दुनिया भर में प्रसारित होता है, खासकर वे देश जो वैज्ञानिक और तकनीकी उत्पादन के क्षेत्र में पिछड़े हुए हैं।

निष्कर्ष: डिप्थीरिया एक गंभीर रोग है जो की समय पर उपचार किया जाना चाहिए। टीकाकरण और अच्छी स्वच्छता और हाइजीन स्तर का पालन डिप्थीरिया के प्रसार को रोकने में मदद कर सकते हैं।

Tuberculosis

परिभाषा: टीबी एक संक्रामक रोग है जो की मैजे, पेट, शरीर के अन्य हिस्सों, या लंग से प्रभावित हो सकता है। इसका कारण मैकोबैक्टीरियम ट्यूबर्क्यूलोसिस (Mycobacterium tuberculosis) नामक बैक्टीरिया होता है।

लक्षण: टीबी के लक्षण में अत्यधिक खांसी, बुखार, वजन कमी, थकान, और रात को पसीना आने का अनियमित लक्षण शामिल होते हैं।

प्रसार: टीबी एक संक्रामक रोग है और यह वायरस के जलवायु, धूल या खांसी द्वारा हवा में फैल सकता है। इसके अलावा, यह एक संक्रमित व्यक्ति से संक्रमित व्यक्ति को संक्रमित कर सकता है।

उपचार: टीबी का सही उपचार एंटीबायोटिक्स द्वारा होता है, जो की रोगी को डॉक्टर के निर्देशनानुसार लेना चाहिए।

प्रतिरोध: टीबी से बचाव के लिए, साफ़ और स्वच्छ वातावरण में रहना, हाथ मुंह का ध्यान रखना, और टीबी वैक्सीन (BCG) का लाभ उठाना चाहिए।

वैश्विक प्रभाव: टीबी एक वैश्विक स्वास्थ्य समस्या है और विशेष रूप से विकासशील देशों में प्रसारित है।Human Health And Diease Neet Question

निष्कर्ष: टीबी एक गंभीर रोग है जो की सही उपचार और बचाव के साथ प्रबंधित किया जा सकता है। सार्वजनिक जागरूकता, स्वच्छता, और सही उपचार की उपलब्धता से इसकी रोकथाम संभव है।

कुष्ठ रोग (Leprosy)

परिभाषा: कुष्ठ रोग (लेप्रोसी) एक संक्रामक रोग है जो की मैजे, त्वचा और अंगों में प्रभावित होता है। इसका कारण मैकोबैक्टीरियम लेप्रा नामक बैक्टीरिया होता है।

लक्षण: कुष्ठ रोग के लक्षण शामिल हो सकते हैं जैसे की नसों का प्रभाव, दाहिने और बाएं हाथ में बदलाव, त्वचा के धब्बे, और अंगों का अक्षम होना।

प्रसार: कुष्ठ रोग का प्रसार संपर्क के माध्यम से होता है, विशेष रूप से छूने या करीब आने से।

उपचार: कुष्ठ रोग का उपचार एंटीबायोटिक्स के माध्यम से होता है, जिसे दिन में नियमित रूप से लेना चाहिए।

प्रतिरोध: कुष्ठ रोग से बचाव के लिए, संक्रामक व्यक्ति से संपर्क से बचना चाहिए।Human Health And Diease Neet Question

वैश्विक प्रभाव: कुष्ठ रोग वैश्विक रूप से प्रसारित है और विकासशील देशों में अधिक पाया जाता है।

निष्कर्ष: कुष्ठ रोग का उपचार संभव है और इससे बचाव किया जा सकता है अगर समय रहते उपचार लिया जाए। इसके लिए सार्वजनिक जागरूकता, सही उपचार, और उचित संबंधित स्वास्थ्य सेवाएं महत्वपूर्ण हैं।

टेटेनस (Tetanus)

परिभाषा: टेटेनस, जिसे लोग कभी-कभी “खांसी का जड़ा हुआ रोग” भी कहते हैं, एक जानलेवा संक्रामक बीमारी है जो Clostridium tetani बैक्टीरिया के कारण होती है।

लक्षण: टेटेनस के लक्षणों में तनाव, अकड़, मस्तिष्क की सक्रियता में बदलाव, खांसी, सांस लेने में मुश्किल, और मांसपेशियों के दर्द शामिल हो सकते हैं।

प्रसार: टेटेनस बैक्टीरिया आमतौर पर जल, मिट्टी और पेट के कीटों के संपर्क से प्रसारित होता है। चोट, खाई, या जलन के कारण इस बैक्टीरिया के प्रवेश के बाद, रोग का प्रारंभ होता है।

उपचार: टेटेनस का उपचार अक्सीजन और एंटीबायोटिक्स द्वारा किया जाता है। टेटेनस टॉक्सीन भी इम्यूनाइजेशन के रूप में प्रयोग किया जा सकता है।

प्रतिरोध: टेटेनस से बचाव के लिए, टेटेनस का टीका लगवाना महत्वपूर्ण है, विशेष रूप से जब व्यक्ति किसी चोट का शिकार होता है।

वैश्विक प्रभाव: टेटेनस दुनिया भर में होता है, खासकर विकासशील और गरीब देशों में।

निष्कर्ष: टेटेनस एक जानलेवा बीमारी है जिसका उपचार समय रहते किया जाना चाहिए। सही टीकाकरण, स्वच्छता, और ज्ञान हमें इस बीमारी से बचाने में मदद कर सकते हैं।Human Health And Diease Neet Question

Typhoid

परिभाषा: Typhoid एक संक्रामक बीमारी है जो भोजन और पानी के माध्यम से फैलती है। इसका कारक Salmonella typhi बैक्टीरिया होता है।

लक्षण: Typhoid के लक्षणों में बुखार, मांसपेशियों में दर्द, उल्टी, दस्त, सिरदर्द, और थकान शामिल हो सकते हैं।

प्रसार: Typhoid संक्रमण एक संक्रामक बीमारी है जो अधिकतर अशुद्ध पानी या भोजन के सेवन के कारण होता है।

उपचार: Typhoid का उपचार एंटीबायोटिक्स के माध्यम से किया जाता है, जो की डॉक्टर के सलाह के अनुसार लिया जाता है।

प्रतिरोध: Typhoid से बचाव के लिए, स्वच्छ पानी पीना, स्वच्छता का ध्यान रखना, और हाथों को धोना महत्वपूर्ण है।

वैश्विक प्रभाव: Typhoid विश्वभर में प्रसारित होती है, खासकर विकासशील और उन्नत देशों में।

निष्कर्ष: Typhoid एक संग्रामक रोग है जिसका उपचार समय पर होना चाहिए। सही हाइजीन और साफ-सुथरा जीवनशैली इस रोग को रोकने में मदद करती है।Human Health And Diease Neet Question

प्लेग (Plague)

परिभाषा: प्लेग एक गंभीर संक्रामक बीमारी है जो की बैक्टीरिया Yersinia pestis के कारण होती है। यह बैक्टीरिया खरगोश और चूहों से फैलती है और इंसानों को भी प्रभावित कर सकती है।

लक्षण: प्लेग के लक्षण में बुखार, गहरा दर्द, गले में सूजन, नाक से ब्लडी डिस्चार्ज, और गुदांत्र क्षेत्र में सूजन शामिल हो सकते हैं।

प्रसार: प्लेग संक्रमण बाइट या छुआई द्वारा, जल, खाने-पीने के सामग्री या संपर्क से फैल सकता है।

उपचार: प्लेग का उपचार एंटीबायोटिक्स के माध्यम से किया जाता है, जो की डॉक्टर के परामर्शानुसार लिया जाता है।

प्रतिरोध: प्लेग से बचाव के लिए, संक्रमित जानवरों से संपर्क से बचना, भोजन को स्वच्छ रखना, और हाथों को धोना महत्वपूर्ण है।

वैश्विक प्रभाव: प्लेग विश्व भर में हो सकती है, लेकिन अधिकांश मामले विकासशील देशों में होते हैं।

निष्कर्ष: प्लेग गंभीर बीमारी है और जल्दी से उपचार किया जाना चाहिए। सही हाइजीन, संयमित संपर्क और स्वच्छता प्लेग के प्रसार को रोकने में मदद कर सकती है।Human Health And Diease Neet Question

काली खांसी (Whooping Cough)

परिभाषा: काली खांसी एक संक्रामक बीमारी है जो की बैक्टीरिया Bordetella pertussis के कारण होती है। यह खांसी अत्यधिक संक्रामक होती है और बच्चों में ज्यादातर देखा जाता है।

लक्षण: काली खांसी के लक्षण में लम्बी खांसी के दौरान गहरी सांस लेने के लिए जीर्णता, नीला चेहरा, खांसी के बाद सिर की ओर लगातार झुकाव, और विषाक्त उल्टी शामिल हो सकते हैं।

प्रसार: काली खांसी का प्रसार इंफेक्टेड व्यक्ति के संपर्क में आने से होता है, खासकर खांसते हुए, छींकते हुए या बोलते हुए।

उपचार: काली खांसी का उपचार अधिकतर एंटीबायोटिक्स के माध्यम से होता है, जो की डॉक्टर की सलाह के अनुसार लिया जाता है।

प्रतिरोध: काली खांसी से बचाव के लिए, टीकाकरण अत्यंत महत्वपूर्ण है, साथ ही बच्चों के लिए स्वच्छता का ध्यान रखना चाहिए।

वैश्विक प्रभाव: काली खांसी विश्वभर में हो सकती है, लेकिन विकासशील और असहिष्णु देशों में इसकी अधिकतम संख्या पाई जाती है।

निष्कर्ष: काली खांसी एक गंभीर संक्रामक रोग है और इसका उपचार समय पर किया जाना चाहिए। टीकाकरण और स्वच्छता इस बीमारी से बचाव में मदद कर सकते हैं।Human Health And Diease Neet Question

एंथ्रैक्स (Anthrax)

परिभाषा: एंथ्रैक्स एक संक्रामक रोग है जो बैक्टीरिया Bacillus anthracis के कारण होता है। यह रोग जानवरों से व्यक्ति के तक पहुँचता है।

लक्षण: एंथ्रैक्स के लक्षणों में त्वचा पर घाव, उनमें सूजन, बुखार, सांस लेने में मुश्किल, और शरीर की गम्भीर शक्ति की कमी शामिल हो सकती है।

प्रसार: एंथ्रैक्स का प्रसार जानवरों से या अंशकर उत्पन्न रहते हैं जैसे धूल या खाद्य सामग्री के माध्यम से होता है।

उपचार: एंथ्रैक्स का उपचार एंटीबायोटिक्स द्वारा किया जाता है, जो कि डॉक्टर की सलाह पर लिया जाता है।

प्रतिरोध: एंथ्रैक्स से बचाव के लिए, जानवरों से संपर्क से बचना, स्वच्छता का ध्यान रखना, और अप्रत्याशित रूप से खाने पीने को नहीं खाना चाहिए।

वैश्विक प्रभाव: एंथ्रैक्स प्राथमिक रूप से गाय और बकरी जैसे जानवरों में देखा जाता है, लेकिन यह मनुष्यों में भी हो सकता है।

निष्कर्ष: एंथ्रैक्स गंभीर रोग है जिसका उपचार तुरंत होना चाहिए। सही सावधानियां और आपातकालीन उपचार एंथ्रैक्स के प्रसार को रोक सकते हैं।Human Health And Diease Neet Question

वाइरस जनित रोग

Chicken Pox छोटी माता

यह एक संक्रामक बीमारी है जो वैरस वैरिसेला जोस्टर के कारण होती है।वायरस जनित रोग छोटी माता को “सिट्रस या चिकित्सा छोटी माता” कहा जाता है। यह एक फ़रब्सिस जनित वायरस की संक्रामक बीमारी है जो खासतौर पर बच्चों में होती है। इसके लक्षणों में बुखार, खांसी, थकावट, खुजली और रेशे होते हैं। इसका उपचार आमतौर पर अनुशासनात्मक होता है और इसका पूरी तरह से उपचार होने में कुछ सप्ताह का समय लग सकता है।

Small Pox चेचक

स्मॉलपॉक्स को हिंदी में “चेचक” या “महामारी” कहा जाता है। यह एक व्यापक संक्रामक बीमारी है जो वायरस वैरियोला मेजोर (Variola major) और वैरियोला माइनर (Variola minor) के कारण होती है। इसके लक्षण में बुखार, खांसी, थकान, खुजली, और रेशे होते हैं। यह बीमारी गंभीर हो सकती है और इसका उपचार चिकित्सीय सहायता के बिना संभव नहीं होता है। अच्छी खबर यह है कि वैक्सीनेशन के कारण, आज यह बीमारी पूरी तरह से उपचार योग्य है और विश्वभर में इसकी खोज हो चुकी है।

poliomyelitis पोलियों

पोलियोमायलाइटिस को हिंदी में “पोलियो” या “बच्चों की पागलता” कहा जाता है। यह एक वायरल संक्रामक बीमारी है जो पोलियोवायरस के कारण होती है। इस बीमारी में बुखार, खोखलापन, पेट की दर्द, अपच, और अवर्णनीय तंगपन जैसे लक्षण होते हैं। यह बीमारी बच्चों को सबसे अधिक प्रभावित करती है, लेकिन वयस्क भी इससे पीड़ित हो सकते हैं।
यह बीमारी एक वायरस के कारण होती है जो मानव शरीर के तंतुओं को नुकसान पहुँचाता है, जिससे शारीरिक कमजोरी और अन्य गंभीर समस्याएं हो सकती हैं। यह बीमारी बच्चों को सबसे अधिक प्रभावित करती है। पोलियो टीका के बदले के रूप में एक पोलियो के बारे में वैक्सीन दिया जाता है, जो इस बीमारी के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करता है।

Rabies रेबीज

रेबीज एक गंभीर और घातक वायरल बीमारी है जो आमतौर पर संक्रमित जानवरों के काटने या खरोंच से मनुष्यों में फैलती है। यह वायरस केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है और उपचार न मिलने पर लगभग हमेशा मृत्यु का कारण बनता है। रेबीज का वायरस मुख्य रूप से कुत्तों में पाया जाता है, लेकिन यह अन्य जानवरों जैसे बिल्लियों, बंदरों, चमगादड़ों आदि में भी हो सकता है।

रेबीज के लक्षण:
रेबीज के लक्षण आमतौर पर संक्रमण के बाद 1 से 3 महीने के अंदर दिखाई देने लगते हैं, लेकिन कभी-कभी यह अवधि कम या ज्यादा भी हो सकती है। इसके प्रमुख लक्षण हैं:

प्रारंभिक लक्षण:

1.बुखार
2.सिरदर्द
3.कमजोरी या अस्वस्थता
4.काटे गए स्थान पर झनझनाहट या जलन
गंभीर लक्षण:

1.उन्माद (ऐंग्जाइटी) और भ्रम
2.अनिद्रा
3.लकवा (पैरालिसिस)
4.हाइड्रोफोबिया (पानी से डर)
5.एयरोफोबिया (हवा से डर)
6.अत्यधिक लार आना
7.दौरे पड़ना
रोकथाम:-
टीकाकरण: रेबीज का टीका जानवरों और मनुष्यों दोनों के लिए उपलब्ध है। संक्रमित जानवर के काटने के बाद तुरंत चिकित्सा सहायता और टीकाकरण बहुत महत्वपूर्ण होता है।
पालतू जानवरों का टीकाकरण: अपने पालतू जानवरों को नियमित रूप से रेबीज के खिलाफ टीका लगवाएं।
जंगली जानवरों से दूर रहना: जंगली जानवरों से दूरी बनाए रखें और अज्ञात जानवरों के संपर्क में आने से बचें।
साफ-सफाई और सावधानी: यदि कोई जानवर काट ले, तो घाव को तुरंत साबुन और पानी से अच्छी तरह धोएं और चिकित्सक से परामर्श लें।

Hepatitis

हेपेटाइटिस एक ऐसी स्थिति है जिसमें यकृत (लीवर) में सूजन हो जाती है। यह कई कारणों से हो सकती है, जिनमें वायरस, शराब का अत्यधिक सेवन, विषाक्त पदार्थ और कुछ अन्य बीमारियाँ शामिल हैं। हेपेटाइटिस के विभिन्न प्रकार हैं, जैसे कि हेपेटाइटिस ए, बी, सी, डी, और ई, जो मुख्य रूप से वायरस के कारण होते हैं। प्रत्येक प्रकार का वायरस लीवर को प्रभावित करता है और विभिन्न तरीकों से फैलता है।

हेपेटाइटिस के प्रकार और उनके कारण:-

हेपेटाइटिस ए:-

*कारण: हेपेटाइटिस ए वायरस (HAV)।
*फैलाव: दूषित भोजन और पानी के माध्यम से।
*रोकथाम: टीकाकरण और स्वच्छता।

हेपेटाइटिस बी:-

*कारण: हेपेटाइटिस बी वायरस (HBV)।
*फैलाव: संक्रमित रक्त, सुई, और यौन संपर्क के माध्यम से।
*रोकथाम: टीकाकरण, सुरक्षित रक्त संक्रमण, और सुरक्षित यौन संबंध।

हेपेटाइटिस सी:-

*कारण: हेपेटाइटिस सी वायरस (HCV)।
*फैलाव: संक्रमित रक्त के संपर्क से, जैसे कि सुई साझा करना।
*रोकथाम: सुरक्षित रक्त संक्रमण और सुई साझा न करना।

हेपेटाइटिस डी:-

*कारण: हेपेटाइटिस डी वायरस (HDV)।
*फैलाव: हेपेटाइटिस बी से संक्रमित व्यक्ति के संपर्क से।
*रोकथाम: हेपेटाइटिस बी के टीकाकरण के माध्यम से।

हेपेटाइटिस ई:-

*कारण: हेपेटाइटिस ई वायरस (HEV)।
*फैलाव: दूषित पानी के माध्यम से।
*रोकथाम: स्वच्छ पेयजल और स्वच्छता।

हेपेटाइटिस के लक्षण:-

बुखार
थकान
भूख में कमी
मतली और उल्टी
पेट दर्द
गहरे रंग का पेशाब
पीली त्वचा और आँखें (पीलिया)
जोड़ों में दर्द

उपचार:-

हेपेटाइटिस का उपचार उसके प्रकार और गंभीरता पर निर्भर करता है।

हेपेटाइटिस ए और ई:-

आमतौर पर यह स्व-स्फूर्त ठीक हो जाते हैं और इनका उपचार लक्षणों को कम करने पर केंद्रित होता है। हेपेटाइटिस बी और सी: ये क्रॉनिक (दीर्घकालिक) संक्रमण का कारण बन सकते हैं और इनके लिए एंटीवायरल दवाएँ आवश्यक होती हैं। हेपेटाइटिस डी: इसके उपचार के लिए भी एंटीवायरल दवाओं की आवश्यकता होती है और यह हेपेटाइटिस बी के इलाज पर निर्भर करता है।

रोकथाम:-

टीकाकरण
स्वच्छता बनाए रखना
सुरक्षित यौन संबंध
दूषित पानी और भोजन से बचाव
रक्त और सुई का सुरक्षित उपयोग

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